Wednesday, November 19, 2014

एक तरफ़ रामपाल आश्रम में गोलीबारी, तो दूसरी तरफ़ श्री श्री शान्ति का सन्देश लेकर ईराक़ पहुँचे

जब एक धर्मगुरु अपने स्वार्थ के लिये अपने आप को क़ानून से भी बड़ा मान लेता है तो इससे बहुतों की धर्म और आध्यात्म के प्रति आस्था टूट जाती है. रामपाल आश्रम के वृत्तान्त ने कुछ ऐसा ही माहौल बनाया. उधर दूसरी ओर श्री श्री रवि शंकर जी ने इराक़ की इतनी अधिक संघर्षपूर्ण स्थिति के दौरान यात्रा करके जो हिम्मत और प्रेम दिखाया है - उससे भारतीय आध्यात्म के प्रति गर्व, उम्मीद और आस्था वापस जुड़ जाती है. सिंजार की पहाड़ियों में यज़दी शरणार्थियों के सहायतार्थ आर्ट ऑफ लिविंग द्वारा राहत सामग्री देने की पहल अत्यंत सराहनीय है. पिछले कई वर्षों से फाउन्डेशन द्वारा इराकी युवकों और युद्धग्रस्त महिलाओं के पुनर्वास हेतु विविध कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं. सुरक्षा की चेतावनियों को नज़र अंदाज़ करते हुए श्री श्री विभिन्न पक्षों से मुलाक़ात कर के शान्तिदूत की भूमिका निभा रहे हैं. ऐसा निस्वार्थ आदर्श अद्वितीय है.   

अब समय आ गया है कि वैश्विक स्तर पर एक सर्व धर्म गाइडेंस काउंसिल का गठन किया जाए जो मौलिक मानवीय मूल्यों का उल्लंघन करने वाले हर किसी धार्मिक अथवा आध्यात्मिक पंथ को सलाह दें. यह एक कड़वा सच है कि विश्व में होने वाले बहुतेरे संघर्षों के पीछे कट्टरवादी धार्मिक सोच है. धर्म के मामले में किसी भी प्रकार के परिवर्तन का हर युग में प्रतिरोध रहा है. परन्तु विश्व शान्ति के लिये और उस धर्म की सार्वभौमिक स्वीकृति के लिये और अंततः उसके अधिक प्रसार के लिये सुधार लाना आवश्यक है. 

पुराने समय से चले आ रहे धार्मिक ग्रंथों की व्याख्या को समकालीन परिस्थितियों पर आधारित करना चाहिए. धर्म के सन्दर्भ में आज की सबसे बड़ी आवश्यकता सहिष्णुता है. टेक्नोलोजी ने पूरे विश्व को समेट लिया है – और वसुधैव कुटुम्बकम की धारणा ने आज एक तथ्यात्मक रूप ले लिया है. किसी भी पंथ, सोच, आस्था, या पद्धति की आपसी तुलना करना व्यर्थ है, हमें इस विविधता का उत्सव बनाना है नाकि आपसी प्रतिस्पर्धा करनी है. इस युग में अपनी प्रजाति अथवा आस्था को एक दूसरे से बेहतर कहना, बिलकुल वैसा है जैसे सेब को संतरे से बेहतर मानना. अधिकतर धर्म ग्रंथों ने अपने ही पथ को श्रेष्ठतम बताया है – यह इसलिए आवश्यक था ताकि मानव का चंचल मन एक जगह टिक जाए और इधर उधर नहीं भटके. 

उदाहरणतः पैगम्बर मोहम्मद के समय छोटे छोटे कबीले सभी मूर्ति पूजा करते थे और उनकी आपस में लड़ाई इसीलिये होती थी क्योंकि वे अपने इष्ट देव को एक दूसरे से बेहतर समझते थे. उस देश और काल में ईश्वर के साकार रूप में फँसे समाज की संकीर्ण विचारधारा को ऊपर उठाने के लिये मोहम्मद साहब का एक निराकार रूप में ईश्वर को देखने की धारणा उपयुक्त थी जिसकी वजह से बंटे हुए लोग एक साथ जुड़ गए और आपसी संघर्ष अंत में समाप्त हुआ. परन्तु आज के समय में भी विश्व के सभी मूर्ति पूजकों को या अल्लाह के बजाय ईश्वर को किसी दूसरे नाम से पुकारने वाले लोगों को निम्न कोटि का मानना बिलकुल उपयुक्त नहीं है. गहराई से देखा जाए तो हिंदू धर्म में भी मूर्ति पूजा प्राण प्रतिष्ठा से प्रारम्भ करी जाती है जिसका यह भाव है – कि जो निराकार ईश्वर मेरे अन्दर ही समाया हुआ है वह कुछ समय के लिये इस मूर्ति में स्थापित हों ताकि उस दिव्य ऊर्जा की अभिव्यक्ति का हम सम्मान कर सकें – और फिर पूजन के पश्चात मूर्ति का विसर्जन कर देने की प्रथा है. सभी धर्मों के रीति रिवाज़  भले ही अलग अलग हों, परन्तु उन सभी का आध्यात्मिक सार सामान्य है. इन समान्यताओं को उजागर करके हम उन सबको एक साथ ला सकते हैं.

इस वैश्विक सर्व धम्र काउंसिल की दूसरी बड़ी जिम्मेदारी होगी – हर पंथ से सामाजिक कुरीतियों का परिशोधन करना. धार्मिक ग्रंथों में यदि ऐसे कोई भी सन्दर्भ पाए जाएँ जो मौलिक मानवाधिकारों का हनन  करे तो उनको उपेक्षित कर दिया जाए – अथवा नवीन दृष्टि से उनकी पुनरव्याख्या कर दी जाए.  उदाहरणार्थ अधिकतर धर्म ग्रंथों के सृजन के समय में नारियों की परिस्थिति  उनके आज की परिस्थिति से बिलकुल भिन्न थी. जिस युग में बुद्धि से अधिक बल का महत्त्व रहा वहाँ फिजियोलोजिकल कारणों से नारियों की भूमिका पीछे रही. उस समय के धार्मिक नियम भी स्त्रियों के तत्कालीन परिस्थिति के अनुसार बनाए गए. परन्तु आज जब बुद्धि और प्रबंधन का ज्यादा महत्त्व हो गया है वहाँ स्त्रियों की मल्टीटास्किंग एबिलिटी और राईट ब्रेन फंक्शनिंग के कारण वे पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिला कर चल रही हैं और कई पहलुओं में पुरुषों के आगे भी है. लिंग भेद के सभी सन्दर्भों को हमें धार्मिक ग्रंथों से हटा देना चाहिए और ऐसे उदाहरणों को ज्यादा उजागर करना चाहिए जिससे समाज में स्त्रियों की अधिक सक्रीय भूमिका बने. 

हम विभिन्न देशों के व्यंजनों को आसानी से स्वीकार कर लेते हैं, चाईनीज़ नूडल्स, इटालियन पिज्ज़ा, या डेनिश पेस्ट्री खाने से हमारी अखंडता नहीं भंग होती. परन्तु धर्म के मामले में हमारी सोच बहुत संकीर्ण है. सभी धर्मों के कुछ न कुछ अच्छे पहलु होते हैं. बच्चों में इन सभी अच्छे पहलुओं के बारे में व्यावहारिक शिक्षा देकर आगे की पीढ़ी में हम सभी धर्मों के प्रति सम्मान की भावना पैदा कर सकते हैं.